गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

अजय ब्रह्मात्मज :जन्मदिन का तोहफा !

                   अजय की इच्छा है कि इस जन्मदिन पर कुछ अलग तरह से उनको जन्मदिन की शुभकामनाएं मिलें और उसको संचित कर रखा जा सके लेकिन यह जिन पलों को मैं यहाँ अंकित करने जा रही हूँ वह सिर्फ अजय के लिए नहीं मेरे लिए भी बहुत ही आत्मिक और अभिभूत  करने वाले पल थे. 
                          सबसे पहले मैं बता दूँ कि मेरा और अजय का रिश्ता जब बना था तो हम दोनों उस दौर से गुजर रहे थे जब पत्र ही संपर्क के साधन थे।  मीनाकुमारी के निधन पर एक फिल्मी पत्रिका "माधुरी" में मेरा संवेदना पत्र प्रकाशित हुआ और वहां से पता लेकर अजय ने मुझे पत्र लिखा था और फिर ये भाई बहन का रिश्ता बना और उस समय जब कि वह किशोर था तब भी उसमें फिल्मी दुनियां में रूचि थी और आज नहीं याद है कि  मैंने उसे कैसे और क्या समझाया होगा ? फिर भी मेरे उन और उस उम्र के सुझावों को कितना महत्व अजय देते  है ये मेरे लिए गर्व की नहीं बल्कि बहुत अधिक अभिभूत करने वाली बात है। अंतर्राष्ट्रीय पटल पर अपनी एक पहचान रखने वाला इंसान कितना सहज और शालीन है ये मैं बताती हूँ। 
                           मैं जून २०१३ में उनकी बेटी विधा सौम्या की शादी के अवसर पर मुंबई गयी थी।  उससे पहले शादी में आने के लिए अजय और विभा के असीम आग्रह को मैं ठुकरा तो नहीं सकती थी। मुझे जो सम्मान  और प्यार विभा और अजय से मिला वह अवर्णनीय है। जब मैं स्टेशन पर उतरी तो मुझे रिसीव करने अजय खुद आये थे।  जिसकी बेटी की शादी हो और वह खुद मुझे लेने आया हो समझने वाली बात है और ये बात बाद में मुझसे रश्मि रविजा ने कही भी। 
 
                          शादी में तो आने वाले मुंबई से थे या फिर अजय या विभा के रिश्तेदार और घर वाले थे। मैं सबसे अलग थी बस रश्मि रविजा से मेरी मित्रता थी। उससे भी मेरी वहाँ मुलाकात पहली थी। 
                               शादी के दूसरे दिन की बात है नाश्ते के समय सिर्फ सारे घर वाले रह गए थे जो आपस में परिचित थे और मैं सबसे अलग थी।  उनमें से कुछ लोगों ने सवाल किया कि ये (मैं) किस की तरफ से हैं , (क्योंकि पहले मुझे किसी ने देखा नहीं था) , यानि कि विभा की तरफ से या फिर अजय की तरफ से ? इस प्रश्न ने मुझे  असहज कर दिया था क्योंकि हमारे समाज में  रिश्तों की यही  परिभाषा है और  उसको मैं कहीं भी पूरा नहीं कर रही थी कि तभी तुरंत अजय बोले  -- 'मैं बताता हूँ सही अर्थों में ये मेरी प्रेरणा स्रोत हैं।  जब मैं बसंतपुर (अजय का घर )  पढता था।  उस समय अजय नवीं  कक्षा में थे।  तब मेरा परिचय दीदी से हुआ था और उन्होंने ही मुझे दिशा दिखाई थी जिस पर मैं आज चल रहा हूँ।'  
                              उस क्षण मुझे लगा कि रिश्ते बनाये और निभाए इस तरीके से जाते हैं। मेरी छोटी बेटी की शादी में जब विभा कीमो थेरेपी के दौर  गुजर रही थी , मैंने  अजय को मना किया था कि विभा को इस समय तुम्हारी ज्यादा जरूरत है , तब भी अजय कानपुर शादी में शामिल हुए थे , जितने घंटों की सफर करके आये थे उतने घंटे रुकना भी नहीं हुआ लेकिन मुझे कितना अच्छा लगा ये मैं व्यक्त नहीं कर सकती।  


       अजय मुझसे छोटे हैं लेकिन मैं उसकी बहुत इज्जत करती हूँ।
                      

2 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…


आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (30.10.2015) को "आलस्य और सफलता "(चर्चा अंक-2145) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

Kavita Rawat ने कहा…

स्नेह का बंधन रिश्तों से बढ़कर होता है ..
बहुत अच्छा लगा स्नेहिल प्रस्तुति पढ़के ..
अजय जी को हार्दिक शुभकामनायें!